क्यूँ इतना दूर है वो
चाहकर भी न आ सके पास
क्यूँ चाहकर भी न चाहना
चाहता है वो.।।
क्या है उसमें जो खिंचा
चला जाता है मन
नहीं जाना चाहते हुए भी
लुट जाने का जी चाहता है
क्यूँ इतना दूर है वो
चाहकर भी न आ सके पास
क्यूँ चाहकर भी न चाहना
चाहता है वो।।
चाहकर भी न आ सके पास
क्यूँ चाहकर भी न चाहना
चाहता है वो.।।
क्या है उसमें जो खिंचा
चला जाता है मन
नहीं जाना चाहते हुए भी
लुट जाने का जी चाहता है
क्यूँ इतना दूर है वो
चाहकर भी न आ सके पास
क्यूँ चाहकर भी न चाहना
चाहता है वो।।
No comments:
Post a Comment